श्रीनगर (गढ़वाल )l हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (एचएनबीजीयू ), श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड, केंद्रीय विश्वविद्यालय, एवं शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के सहयोग से चौरास परिसर स्थित अकादमिक गतिविधि केंद्र में दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के संकाय सदस्यों, अकादमिक विशेषज्ञों तथा शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया।
कार्यशाला के उद्घाटन समारोह में विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. श्री प्रकाश सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बिड़ला परिसर के निदेशक प्रो. हरभजन सिंह चौहान विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के अकादमिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने विषय विशेषज्ञ के रूप में प्रतिभागियों को संबोधित किया। कार्यक्रम की कार्यवाही का संचालन में प्रो. नारायण दत्त (पूर्णकालिक राज्य समन्वयक, उत्तराखंड), डॉ. अलका सूरी (राज्य समन्वयक, भारतीय भाषा समिति), डॉ. रचना विश्वकर्मा (अकादमिक समन्वयक), डॉ. सुधांशु भूषण (अकादमिक समन्वयक) एवं डॉ. आलोक सागर गौतम (समन्वयक) ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया|
कार्यशाला के प्रतिभागियों को इसकी केंद्रीय विषयवस्तु से अवगत कराया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य 22 भारतीय भाषाओं में विद्यालयी एवं उच्च शिक्षा के लिए संवादात्मक डिजिटल पुस्तकों के रूप में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षण सामग्री विकसित करना है। इस पहल का उद्देश्य बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करना, गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री तक विद्यार्थियों की पहुँच बढ़ाना तथा देशभर में ज्ञान को अधिक सुलभ बनाना है।
अपने संबोधन में विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. श्री प्रकाश सिंह ने भारत की समृद्ध बौद्धिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में इस पहल के महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “पुस्तकें लिखकर व्यक्ति अमृत पिए बिना भी अमर हो सकता है।” पुस्तकों को हमारी अमूल्य धरोहर बताते हुए उन्होंने भारतीय भाषाओं में शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रयास से शिक्षा का विस्तार होगा तथा समाज के व्यापक वर्ग तक ज्ञान की पहुँच सुनिश्चित की जा सकेगी।
कुलपति ने भारतीय ज्ञान परंपराओं की विविधता, उनके ऐतिहासिक विकास तथा देश की समृद्ध बौद्धिक विरासत पर भी प्रकाश डाला। कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इसके पंद्रहवें अध्याय में अनुसंधान पद्धति पर चर्चा की गई है, जो प्राचीन भारतीय साहित्य में निहित ज्ञान की गहराई और समृद्धि को दर्शाता है। उन्होंने ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने तथा उन्हें व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया। अपने संबोधन के समापन पर उन्होंने कहा कि “पुस्तक लेखन राष्ट्र निर्माण है।” उनका यह कथन राष्ट्र निर्माण में ज्ञान के सृजन, संरक्षण और प्रसार की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।
विषय विशेषज्ञ डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने भारतीय भाषाओं के संवर्धन में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए प्रौद्योगिकी आधारित बहुभाषी सामग्री के विकास के माध्यम से एक संपूर्ण उद्योग विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद केवल शब्दों के रूपांतरण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मूल रचनाओं की अवधारणाओं, अर्थ और मूल भावना को भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने आगे बताया कि इस पहल की घोषणा केंद्रीय बजट 2025 में की गई थी, जिसके अंतर्गत 2.5 लाख पुस्तकों के विकसित किए जाने का प्रस्ताव है।
इस कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. आलोक सागर गौतम ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। अपने संबोधन में उन्होंने उत्तराखंड राज्य में पुस्तक प्रकाशन की प्रक्रिया, पुस्तकों के लेखन तथा राज्य के विभिन्न शिक्षाविदों के सामूहिक सहयोग से पुस्तकों के प्रकाशन की संभावनाओं पर विस्तारपूर्वक चर्चा की। उन्होंने इस दिशा में आपसी समन्वय एवं सहयोग के महत्त्व पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में कुल 75 प्रतिभागियों ने सहभागिता की, जिनमें 65 संकाय सदस्य एवं अकादमिक पेशेवर, आठ शोधार्थी तथा दो विद्यार्थी शामिल थे। ये प्रतिभागी उत्तराखंड के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए थे। प्रतिभागियों की व्यापक भागीदारी बहुभाषी शैक्षणिक संसाधनों के विकास तथा शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के प्रति अकादमिक समुदाय की रुचि को दर्शाती है।
उद्घाटन सत्र ने संवादात्मक डिजिटल पुस्तकों के विकास, भारतीय भाषाओं के साथ प्रौद्योगिकी के एकीकरण तथा भारत की समृद्ध ज्ञान परंपराओं के व्यापक प्रसार पर सार्थक चर्चा के लिए आधार तैयार किया। यह कार्यशाला समावेशी, सुलभ और उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षणिक संसाधनों के निर्माण में योगदान देने के साथ-साथ देश की शिक्षा व्यवस्था एवं बौद्धिक परिदृश्य में भारतीय भाषाओं की भूमिका को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ कविता भट्ट ने किया जबकि डॉ आलोक सागर गौतम ने कार्यक्रम के समन्वय एवं सुचारु संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवसर पर उपस्थित अन्य विशिष्ट अतिथियों में प्रो. आर. एस. नेगी, प्रो. सीमा धवन, प्रो. डी. एस. नेगी, प्रो. एम. एस. नेगी, प्रो. सुरेंद्र सिंह बिष्ट, प्रो. बी. पी. नैथानी सहित अनेक संकाय सदस्य एवं शिक्षाविद् शामिल रहे।
