जयपुर। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर एवं राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में रसशास्त्र एवं भैषज्य कल्पना विषय पर आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर में आयोजित इस कार्यक्रम में आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण, सुरक्षा और प्रभावकारिता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञों ने सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। कार्यक्रम का उद्देश्य पारंपरिक आयुर्वेदिक औषध निर्माण पद्धतियों और आधुनिक गुणवत्ता मानकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना रहा।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान की कुलसचिव प्रो. अनिता शर्मा, WHO-SEARO से जुड़े प्रो. पवन के. गोडत्वार तथा उपनिदेशक (प्रशासन) चंद्रशेखर शर्मा ने सहभागिता की। प्रशिक्षण सत्रों के दौरान विशेषज्ञों ने आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन और उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के महत्व पर प्रकाश डाला। रसशास्त्र एवं भैषज्य कल्पना विभाग, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर के विभागाध्यक्ष डॉ. अनुपम श्रीवास्तव ने विषय से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं। वहीं, सीताराम आयुर्वेद लिमिटेड, त्रिशूर के प्रबंध निदेशक एवं सीआरएवी गुरु डॉ. डी. रामनाथन, ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, बसई दारापुर, नई दिल्ली के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. जी. प्रभाकर राव तथा राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के प्रो. राजेंद्र प्रसाद शर्मा ने विशेषज्ञ व्याख्यान दिए। प्रशिक्षण के दौरान आयुर्वेदिक औषधियों की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावकारिता सुनिश्चित करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने वैश्विक गुणवत्ता मानकों और गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज () के अनुपालन की आवश्यकता बताई। औषध निर्माण के विभिन्न चरणों में गुणवत्ता नियंत्रण बनाए रखने और निर्धारित मानकों के अनुसार निर्माण प्रक्रिया संचालित करने पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यक्रम में रसशास्त्र की पारंपरिक विधियों के अंतर्गत कुपीपक्व एवं पोट्टली निर्माण की प्रक्रियाओं पर भी विस्तार से जानकारी दी गई। प्रतिभागियों को इन विधियों के सैद्धांतिक पहलुओं के साथ औषध निर्माण में बरती जाने वाली सावधानियों और गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रियाओं से अवगत कराया गया। प्रशिक्षण को व्यावहारिक स्वरूप देने के लिए प्रतिभागियों को संस्थान की फार्मेसी का भ्रमण भी करवाया गया। इस दौरान उन्हें औषध निर्माण की विभिन्न प्रक्रियाओं को नजदीक से समझने का अवसर मिला। फार्मेसी भ्रमण के माध्यम से पारंपरिक औषध निर्माण तकनीकों और गुणवत्ता संबंधी मानकों के व्यावहारिक उपयोग की जानकारी दी गई। दो दिवसीय कार्यक्रम में पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक गुणवत्ता प्रणालियों के साथ जोड़ने की आवश्यकता रेखांकित की गई। साथ ही प्रतिभागियों के विषयगत ज्ञान को बढ़ाने और औषध निर्माण एवं गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े व्यावहारिक कौशल को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान और राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ की इस संयुक्त पहल के माध्यम से आयुर्वेदिक औषध निर्माण की पारंपरिक विधाओं, गुणवत्ता मानकों और सुरक्षा संबंधी प्रक्रियाओं के प्रति समझ विकसित करने का प्रयास किया गया।
